महिला अधिकारों की समर्थक डॉ. प्रियंका वर्मा ने महिला आरक्षण बिल को लेकर विपक्षी पार्टियों पर तीखा हमला करते हुए बोला और कहा कि देश की महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने के मुद्दे पर दशकों तक राजनीति चलती आ रही है. आज जब महिला आरक्षण बिल को मंजूरी मिल चुकी है, तब विपक्षी पार्टियां इसकी प्रक्रिया और समय-सीमा पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि यह कानून लगभग 27 वर्षों तक विभिन्न राजनीतिक कारणों से अटका रहा.
महिला आरक्षण बिल महिलाओं को बराबरी देने का प्रयास
डॉ. प्रियंका वर्मा ने न्यूज़ ऑफ़ नेशन की टीम को जानकारी देते हुए कहा कि महिला आरक्षण का मुद्दा कोई नया विषय नहीं है. देश में वर्षों से यह मांग उठ रही है कि संसद, विधानसभाओं में महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले. लेकिन जब-जब इस विषय पर ठोस निर्णय लेने का अवसर आया, तब-तब राजनीतिक विरोध के कारण यह कानून आगे नहीं बढ़ सका. महिला आरक्षण बिल का उद्देश्य किसी पुरुष का अधिकारों छीनना नहीं बल्कि यह बिल केवल महिलाओं को बराबरी देने का प्रयास है. विपक्षी दल महिलाओं के अधिकारों की बात तो करते रहे लेकिन जब महिलाओं को वास्तविक रूप से राजनीतिक भागीदारी देने का अवसर आया तब वे एकजुट होकर कोई निर्णायक कदम नहीं उठा सके.

आखिर इतने लंबे वर्षों तक महिलाओं को संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार क्यों नहीं मिला. यदि विपक्षी पार्टियों में महिला सशक्तिकरण वास्तव उनकी प्राथमिकता होती तो यह कानून वर्षों पहले लागू हो चुका होता. उन्होंने कहा कि महिलाओं के नाम पर राजनीति करना आसान तो है, लेकिन महिलाओं को वास्तविक अधिकार देना ही सच्चा महिला सम्मान है. वर्तमान समय में हमारे संसद में महिलाओं की संख्या 15 प्रतिशत के आसपास है जो देश की कुल आबादी के अनुपात में काफी कम है. यदि आज की महिलाएं घर संभाल सकती हैं, बच्चों का भविष्य बना सकती हैं, खेतों में मेहनत कर सकती हैं, व्यापार और नौकरी में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकती हैं, तो फिर संसद और विधानसभा में उनकी संख्या इतनी कम क्यों है?
महिलाओं की भागीदारी बढ़ना लोकतंत्र के मजबूती के लिए आवश्यक
पंचायतों से लेकर स्थानीय निकायों में महिलाओं को आरक्षण मिलने के बाद देश ने एक ऐसा भी दौर देखा है कि जब लाखों महिलाएं सफल जनप्रतिनिधि बनकर उभरी हैं और उन्होंने विकास कार्यों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. ऐसे में संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ना लोकतंत्र के मजबूती के लिए आवश्यक है. डॉ. प्रियंका वर्मा ने आगे कहा कि जब महिलाएं कानून बनाने वाली संस्थाओं में अधिक संख्या में पहुंचेंगी, तब लड़कियों की शिक्षा, महिला सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, मातृत्व अधिकार, पोषण और रोजगार जैसे विषयों पर बेहतर नीतियां बन सकती है. उन्होंने कहा कि आज के विपक्ष को इस मुद्दे पर राजनीति करने के बजाय महिलाओं के हित में एकजुट होकर काम करना चाहिए.

यदि वास्तव में महिलाओं का विकास और सशक्तिकरण उनकी प्राथमिकता है, तो उन्हें इस ऐतिहासिक कदम का समर्थन करना चाहिए. 27 वर्षों तक इंतजार करने के बाद देश ने महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है. अब समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, बल्कि महिलाओं को राजनीति और नीति निर्माण में उनकी उचित भागीदारी दिलाने का है. महिला आरक्षण बिल केवल एक कानून नहीं, बल्कि देश की करोड़ों महिलाओं के सपनों और अधिकारों का प्रतीक है. लोकतंत्र तभी पूर्ण होगा जब महिलाओं की आवाज संसद और विधानसभाओं में समान रूप से गूंजेगी और जब उनको बराबरी भागीदारी मिलेगी. देश के विकास की दिशा तय करने में उनकी सक्रिय भूमिका बेहद आवश्यक है।
शम्भूनाथ गुप्ता पिछले 6 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत हैं. वे ‘मीडिया दस्तक’ और ‘बस्ती चेतना’ जैसे प्लेटफॉर्म्स पर न्यूज़ एवं वीडियो एडिटिंग टीम में अपनी महत्वपूर्ण सेवाएं दे चुके हैं. न्यूज़ प्रोडक्शन, डिजिटल कंटेंट निर्माण और ग्राउंड रिपोर्टिंग में उन्हें गहरा अनुभव प्राप्त है. इसके साथ ही वे ‘भारतीय बस्ती’ में कंटेंट राइटर के रूप में भी कार्य कर चुके हैं, जहां उन्होंने उत्तर प्रदेश से जुड़ी खबरों के लेखन और डिजिटल प्रकाशन में अहम भूमिका निभाई. वर्तमान में वे ‘न्यूज़ ऑफ नेशन’ में संपादक के पद पर कार्यरत हैं और निष्पक्ष, गंभीर व सटीक पत्रकारिता के माध्यम से समाज से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से सामने ला रहे हैं.


